Solution:फ्लोरोसेंट ट्यूब या नियॉन साइन बल्ब के भीतर जब विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है, तो उसके अंदर भरी गैस (जैसे नियॉन या आर्गन) ऊष्मित होकर प्लाज्मा (Plasma) में बदल जाती है। प्लाज्मा पदार्थ की वह अवस्था है जिसमें गैस के परमाणु आयनित हो जाते हैं, जिससे मुक्त इलेक्ट्रॉनों और आयनों का एक चमकता हुआ मिश्रण तैयार होता है। इस प्रक्रिया के दौरान, गैस के अणु अत्यधिक ऊर्जा प्राप्त कर लेते हैं और जब वे अपनी सामान्य अवस्था में वापस आते हैं, तो वे प्रकाश के रूप में ऊर्जा उत्सर्जित करते हैं।
इस चमक का रंग पूरी तरह से ट्यूब में मौजूद गैस की प्रकृति पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, यदि ट्यूब में नियॉन गैस भरी हो, तो वह एक विशिष्ट लाल-नारंगी रंग के साथ चमकती है, जबकि हीलियम गैस होने पर वह पीली या गुलाबी चमक पैदा करती है। साधारण घरों में इस्तेमाल होने वाली फ्लोरोसेंट ट्यूब में पारे की वाष्प (Mercury Vapor) का उपयोग किया जाता है, जो अदृश्य पराबैंगनी किरणें उत्पन्न करती है; ये किरणें जब ट्यूब की दीवार पर चढ़े 'फॉस्फर' (Phosphor) पाउडर से टकराती हैं, तब हमें सफेद रोशनी दिखाई देती है। अतः, यह प्लाज्मा ही वह 'विशेष पदार्थ' है जो गैस के गुणों के आधार पर रंगीन प्रकाश का सृजन करता है।