स्वराज पार्टी का गठन (1923) (UPPCS)

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11. निम्न में से कौन एक स्वराज पार्टी से संबंधित नहीं थे? [U.P.P.C.S. (Mains) 2014]

Correct Answer: (d) राजेंद्र प्रसाद
Solution:

स्वराज दल का नेतृत्व मुख्य रूप से मोतीलाल नेहरू और चित्तरंजन दास कर रहे थे, जबकि राजेंद्र प्रसाद इस दल में शामिल नहीं थे। वे 'अपरिवर्तनवादी' गुट के प्रमुख नेता थे, जो विधान परिषदों में प्रवेश के बजाय गांधीजी के रचनात्मक कार्यक्रमों और बहिष्कार की नीति को जारी रखना चाहते थे। स्वराज दल के अन्य प्रमुख सदस्यों में विट्ठलभाई पटेल और हकीम अजमल खान जैसे नेता शामिल थे, जिन्होंने सदन के भीतर रहकर ब्रिटिश नीतियों का विरोध करने की रणनीति अपनाई थी।

12. बिहार में स्वराज दल का गठन किसने किया? [65th B.P.S.C. (Pre) 2019]

Correct Answer: (a) श्रीकृष्ण सिंह
Solution:

बिहार में स्वराज दल का गठन श्री कृष्ण सिंह ने किया था। फरवरी 1923 में बिहार में स्वराज दल की शाखा स्थापित की गई थी। हालांकि, राष्ट्रीय स्तर पर चित्तरंजन दास और मोतीलाल नेहरू ने इसकी नींव रखी थी, लेकिन बिहार में इसे संगठित करने का श्रेय बिहार के भविष्य के प्रथम मुख्यमंत्री श्री कृष्ण सिंह को जाता है। इस प्रांतीय शाखा के प्रथम अध्यक्ष नारायण प्रसाद और सचिव प्रोफेसर अब्दुल बारी थे। बिहार के स्वराजियों का मुख्य लक्ष्य भी राष्ट्रीय स्वराज पार्टी की तरह ही विधान परिषदों के चुनावों में भाग लेकर सरकार की नीतियों का विरोध करना था।

13. निम्नलिखित घटनाओं का सही कालक्रम चुनिए- [R.A.S./R.T.S. (Pre) 2018]

(i) लखनऊ समझौता                   (ii) स्वराज दल की स्थापना
(iii) जलियांवाला हत्याकांड           (iv) बाल गंगाधर तिलक की मृत्यु

निम्नलिखित कूट में से उत्तर चुनिए-

Correct Answer: (c) (i), (iii), (iv) एवं (ii)
Solution:

उपर्युक्त घटनाओं का क्रम इस प्रकार है-
• लखनऊ समझौता- 1916,
• जलियांवाला हत्याकांड- 1919,
• बाल गंगाधर तिलक की मृत्यु- 1920,
• स्वराज दल की स्थापना- 1923.

14. स्वतंत्रता पूर्व भारत में निम्नलिखित में से किसने केंद्रीय विधानसभा में स्वराज दल का समर्थन किया था ? [U.P. P.C.S. (Pre) 2017]

Correct Answer: (a) एम.ए. जिन्ना
Solution:

नवंबर, 1923 में विधान परिषदों के चुनाव हुए। सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली की 104 निर्वाचित सीटों में से 42 पर स्वराज पार्टी की जीत हुई। मध्य प्रांत में इन्हें स्पष्ट बहुमत मिला। बंगाल में यह सबसे बड़े दल के रूप में उभरी और बंबई तथा संयुक्त प्रांत में भी इसे अच्छी सफलता मिली। मद्रास और पंजाब में जातिवाद और सांप्रदायिकता की लहर के कारण इसे खास सफलता नहीं मिली। सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में स्वराजियों ने एक साझा राजनीतिक मोर्चा बनाया। इसमें जिन्ना के नेतृत्व में उनके समर्थक, उदारवादी व व्यक्तिगत रूप से कुछ विधायक जैसे मदन मोहन मालवीय आदि शामिल थे।

15. निम्नलिखित में से कौन 'देशबंधु' के नाम से प्रसिद्ध है? [U.P. P.C.S. (Mains) 2006]

Correct Answer: (b) चितरंजन दास
Solution:

चितरंजन दास को 'देशबंधु' के नाम से जाना जाता था। देशबंधु का तात्पर्य है- The Friend of Nation. चितरंजन दास इंग्लैंड से वकालत की पढ़ाई करने के बाद स्वदेश आकर बैरिस्टर हो गए तथा वकील के रूप में इनकी सबसे बड़ी सफलता अलीपुर बमकांड केस में अरविंद घोष का बचाव करना था। उन्होंने मोतीलाल नेहरू के साथ मिलकर 'स्वराज पार्टी' की स्थापना की थी।

16. स्वराज आम जनता के लिए होना चाहिए केवल वर्गों के लिए नहीं, के प्रसिद्ध सूत्र की घोषणा की- [42nd B.P.S.C. (Pre) 1997]

Correct Answer: (a) सी.आर. दास ने
Solution:

यह प्रसिद्ध कथन देशबंधु चित्तरंजन दास का है। उनका स्पष्ट मानना था कि स्वराज का लाभ केवल मुट्ठी भर विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों या शिक्षित समुदायों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसमें भारत की समस्त जनता का हित निहित होना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी थी कि यदि स्वराज आम जनता के लिए नहीं होगा, तो वह केवल 'वर्ग-राज' बनकर रह जाएगा। उनके इस दृष्टिकोण ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को और अधिक समावेशी और जन-ोन्मुख बनाने की प्रेरणा दी।

17. कांग्रेसी नेताओं द्वारा मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट की निंदा करने पर कई नरमपंथियों ने पार्टी को छोड़कर निम्न में से कौन-सी पार्टी का गठन किया? [I.A.S. (Pre) 2003]

Correct Answer: (d) इंडियन लिबरल फेडरेशन
Solution:

मॉण्टेग्यू घोषणा के संबंध में कांग्रेस में मत भिन्नता के फलस्वरूप अंततः कांग्रेस में पुनः विघटन हुआ। सूरत विघटन (1907) के समय उदारवादियों ने उग्रवादियों को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया था पर इस बार उदारवादियों ने ही कांग्रेस को छोड़ दिया। सुरेंद्रनाथ बनर्जी के नेतृत्व में कांग्रेस के उदारवादी एवं नरमपंथी नेताओं ने मॉन्टेग्यू- चेम्सफोर्ड सुधारों का स्वागत किया तथा कांग्रेस से अलग होकर इंडियन लिबरल फेडरेशन (अखिल भारतीय उदारवादी संघ) की स्थापना की।

18. 1918 में मोंटफोर्ड सुधारों पर कांग्रेस ने एक महत्वपूर्ण रुख अपनाया, जिसके कारण पुराने उदारवादी अवशेष (सप्रू, जयकर और चिंतामणि) टूट गए, जिन्होंने गठन किया- [68th B.P.S.C. (Pre) 2022]

Correct Answer: (a) इंडियन नेशनल लिबरल फेडरेशन का
Solution:

अगस्त, 1917 में भारत के राज्य सचिव एडविन मांटेग्यू ने ब्रिटिश संसद में एक ऐतिहासिक घोषणा की जिसे मांटेग्यू घोषणा (अगस्त घोषणा) कहा गया। इस घोषणा में भारत में प्रशासन और स्वशासी संस्थानों के विकास में भारतीयों की बढ़ती भागीदारी का प्रस्ताव रखा गया। मांटेग्यू ने इन सुधारों पर कार्य करने के लिए तत्कालीन वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड के साथ मिलकर भारत में संवैधानिक सुधार शीर्षक से एक विस्तृत रिपोर्ट निकाली जिसे मोंटफोर्ड रिपोर्ट अथवा मांटेंग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट कहा जाता है। यह रिपोर्ट वर्ष 1918 में प्रकाशित हुई। इस रिपोर्ट को लेकर कांग्रेस के अंदर उदारवादी और उग्रवादी गुटों के बीच मतभेद स्पष्ट हो गए। परिणामस्वरूप उदारवादी जो मोंटफोर्ड रिपोर्ट के पक्ष में थे वर्ष 1919 में कांग्रेस से अलग होकर सुरेंद्रनाथ बनर्जी के नेतृत्व में 'इंडियन नेशनल लिबरल फेडरेशन' नामक नए दल की स्थापना की।

19. निम्नलिखित में से किन लोगों ने 16 दिसंबर, 1922 को इंडिपेंडेट पार्टी बनाने का निर्णय लिया था? नीचे दिए गए कूट से सही उत्तर चुनिए- [U.P. P.C.S. (Mains) 2006]

1. लाला हरदयाल                2. मदन मोहन मालवीय
3. मोहम्मद अली जिन्ना         4. मोतीलाल नेहरू

कूट :

Correct Answer: (d) 2 तथा 4
Solution:

16 दिसंबर, 1922 को इंडिपेंडेंट पार्टी बनाने का निर्णय मदन मोहन मालवीय तथा मोतीलाल नेहरू ने लिया था। मदन मोहन मालवीय हिंदू महासभा के संस्थापक सदस्य थे। इन्होंने वर्ष 1916 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की। मोतीलाल नेहरू ने सी.आर. दास के साथ मिलकर स्वराज पार्टी की भी स्थापना की।

20. 'सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली' का प्रथम भारतीय अध्यक्ष (स्पीकर) कौन था ? [Uttarakhand U.D.A./L.D.A. (Pre) 2007]

Correct Answer: (b) विट्ठलभाई जे. पटेल
Solution:

'सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली' (केंद्रीय विधान परिषद) के प्रथम भारतीय अध्यक्ष (स्पीकर) विट्ठलभाई पटेल थे। वे 1925 में इस पद पर निर्वाचित हुए थे। यह स्वराज पार्टी के लिए एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक और राजनीतिक जीत मानी जाती थी, क्योंकि एक भारतीय ने ब्रिटिश सरकार के विधायी सदन के सर्वोच्च पद पर कब्जा किया था। उन्होंने सर फ्रेडरिक व्हाईट (जो पहले नियुक्त अध्यक्ष थे) के बाद यह पद संभाला। वे पहले निर्वाचित भारतीय अध्यक्ष बने। वे सरदार वल्लभभाई पटेल के बड़े भाई थे।