Solution:1857 के विद्रोह को अपनी आँखों से देखने वाले प्रसिद्ध उर्दू कवि मिर्जा गालिब थे। जब दिल्ली में विद्रोह की आग भड़की और अंग्रेजों ने शहर को दोबारा जीतने के लिए भीषण मारकाट मचाई, तब गालिब दिल्ली में ही मौजूद थे। दस्तंबू गालिब की फारसी भाषा में लिखी गई एक महत्वपूर्ण डायरी है, जिसमें उन्होंने 11 मई, 1857 से लेकर 1 अगस्त, 1858 तक के दिल्ली के हालात का वर्णन किया है।
मिर्जा गालिब ने अंग्रेजों द्वारा दिल्ली पर पुनः अधिकार करने के बाद की स्थिति को बयां करते हुए कहा था कि— "यहाँ मेरे सामने रक्त का एक विशाल सागर है, खुदा ही जानता है कि मुझे अभी और क्या-क्या देखना बाकी है।"