नया निश्चय ही एक मूल्य है। पर निरंतरता भी एक मूल्य है। साहित्य दोनों में से एक को चुनने की हिमाकत सौभाग्य से नहीं करता है, क्योंकि वह जानता है कि एक के बिना दूसरा संभव नहीं है। परंपरा अपने को पुनर्नवा किए बिना सजीव नहीं रह सकती। मनुष्य दोनों आयामों में रहता है इतिहास में और अनन्त में।
वह बदलता है और फिर भी बना रहता है। दोनों आयाम मनुष्य के यहाँ अंतर्भुक्त हैं वे अलग-थलग या विविक्ति नहीं होते। बहुत कुछ बदलता है समाज, परिस्थितियाँ, आर्थिक व्यापार, मानव संबंध और उनके संगुंफन आदि पर प्रेम, ईर्ष्या, मोह-मत्सर, रोग विराग, हर्ष-विषाद आदि वही बने रहते हैं।
नयी दृष्टि होती है,तो अपने लिए अनवार्यतः नया शिल्प भी खोजती है। विश्लेषन के लिए भले हम कथ्य और शिल्प को अलग-थलग कर लेते हैं, पर रचना में वे अद्वैत हैं। नया अंततः निरंतरता में समाहित होकर अपनी वैधता पता है, पर वह निरंतरता में समाहित होकर अपनी वैधता पाता है, पर वह निरंतरता को कहीं न कहीं बदल भी देता है। निरंतरता नए के हस्तक्षेप और उसके समाहार के बाद वही नहीं रह जाती, जो पहले थी।
हम यह भूल जाते हैं कि आज जो पुराना लगता है, वह कभी नया था। बिना समाकालीनता के कालातीत नहीं हुआ जा सकता, लेकिन सिर्फ समाकालीनता के बाड़े में बँचे रहकर भी कालाजीत नहीं हुआ जा सकता।
नया समय को सीधे और उसके बदले हुए ब्योरों में पकड़ने के साहस से उपजता है, पर अगर वह समय के पार में देख पाये, तो टिकाऊ नहीं हो सकता। जो कालातीत है, वही हर समय नया होता चलता है।
साहित्य का अभीष्ट है:
Correct Answer: 3. नयेपन एवं निरंतरता दोनों को चुनना
Solution:गद्यांश में कहा गया है कि साहित्य केवल नया या केवल निरंतरता नहीं चुनता, बल्कि दोनों को साथ लेकर चलता है। परंपरा बिना नवीनता के जीवित नहीं रह सकती और नवीनता निरंतरता में समाहित होकर ही वैधता पाती है। अतः साहित्य का अभीष्ट नयेपन और निरंतरता दोनों का चयन करना है।