अचल खड़े रहते जो ऊँचा शीश उठाए तूफानों में, सहनशीलता, दृढ़ता हँसती जिनके यौवन के प्राणों में। वही पंथ बाधा को तोड़े बहते हैं जैसे हों निर्झर, प्रगति नाम को सार्थक करता यौवन दुर्गमता पर चलकर।
आज देश की भावी आशा बनी तुम्हारी ही तरुणाई, नएजन्म की श्वास तुम्हारे अंदर जगकर है लहराई। आज विगत युग के पतझर पर तुमको नव मधुमास खिलाना, नवयुग के पृष्ठों पर तुमको है नूतन इतिहास लिखाना।
उठो राष्ट्र के नवयौवन तुम दिशा-दिशा का सुन आमंत्रण, जागो, देश के प्राण जगा दो नए प्रात का नया जागरण। आज विश्व को यह दिखला दो हममें भी जागी तरुणाई, नई किरण की नई चेतना में हमने भी ली अंगड़ाई।
काव्यांश का उचित शीर्षक चुनिए।