अपने ही कल्पना-पट पर इन अनुभव प्रक्षेपणों के सही-सही कलात्मक चित्र प्रस्तुत करने के लिए, न केवल मार्मिक मनन और उनके संकलन संचयन की आवश्यकता है, वरन इसके बहुत-बहुत पहले विश्व-दृष्टि की आवश्यकता है।
इस दृष्टि के अभाव में अपने ही अनुभवों के ठीक-ठीक महत्व हम आँक नहीं पाते और इसलिए केवल कुछविशिष्ट अनुभवों या अनुभवाभासों को ही तरजीह देकर अन्य महत्वपूर्ण अनुभवों का गला घोंट देते हैं। क्या यह सच नहीं है।
मेरेख्याल से यह एक तथ्य है। इसरुख का नतीजा यह होता है कि बहुत बार हमारा साहित्यिक विकास जिस दिशा में जैसा होना चाहिए वैसा नहीं हो पाता। हम जो अनुभव,साहित्य प्रकटीकरण के लिए, प्रवृत्तिवश चुन लेते हैं उनकी हमें बाद में आदत पड़ जाती है,
उनके चित्रण-अंकन का अभ्यास हो जाने के कारण हम केवल उन्हें ही प्रकट करते रहते हैं। शेष अनुभव, अपनी गहराई, तीव्रता तथा प्रभावशालित्व के बावजूद मन के अंधेरे में पड़े रहते हैं, भले ही कभी-कभी उनकी गूंज हमारे द्वारा निर्मित साहित्य में चली आये।
साहित्यकार का साहित्य लेखक के अनुसार प्रवृत्तिवश चयनित है।
Correct Answer: (d) अनुभव
Solution:साहित्यकार का साहित्य लेखक के अनुसार 'अनुभव' प्रवृत्तिवश चयनित है।