गुरुदेव वहाँ बड़े आनंद में थे। अकेले रहते थे। भीड़-भाड़ उतनी नहीं होती थी, जितनी शांतिनिकेतन में। जब हम लोग ऊपर गए तो गुरुदेव बाहर एक कुर्सी पर चुपचाप बैठे अस्तगामी सूर्य की ओर ध्यान-स्तिमित नयनों से देख रहे थे।
हम लोगों को देखकर मुस्कुराए,बच्चों से जरा छेड़-छाड़ की, कुशल प्रश्न पूछे और फिर चुप हो रहें ठीक उसी समय उनका कुत्ता धीरे-धीरे ऊपर आया और उनके पैरों के पास खड़ा होकर पूँछ हिलाने लगा। गुरुदेव ने उसकी पीठ पर हाथ फेरा।
वह आँखें मूंदकर अपने रोम-रोम से उस स्नेहरस का अनुभव करने लगा। गुरुदेव ने हम लोगों की ओर देखकर कहा, “देखा तुमने, यह आ गए।कैसे इन्हें मालूम हुआ कि मैं यहाँ हू,आश्चर्य है! और देखो, कितनी परितृप्ति इनके चेहरे पर दिखाई दे रही है।”
हम लोग उस कुत्ते के आनंद को देखने लगे।किसी ने उसे राह नहीं दिखाई थी, न उसे यह बताया था कि उसके स्नेह- दाता यहाँ से दो मील दूर हैं और फिर भी वह पहुँच गया। इसी कुत्ते को लक्ष्य करके उन्होंने 'आरोग्य' में इस भाव की एक कविता लिखी थी
'प्रतिदिन प्रातः काल यह भक्त कुत्ता स्तब्ध होकर आसन के पास तब तक बैठा रहता था, जब तक अपने हाथों के स्पर्श से मैं इसका संग नहीं स्वीकार करता। इतनी-सी स्वीकृति पाकर ही उसके अंग-अंग में आनंद का प्रवाह बह उठता है।
इस वाक्य हीन प्राणिलोक में सिफ यही एक जीव अच्छा-बुरा सबको भेदकर संपूर्ण मनुष्य को देख सका है,उस आनंद को देख सकता है,जिसे प्राण दिया जा सकता है, जिसमें अहैतुक प्रेम ढाल दिया जा सकता है,
जिसकी चेतना असीम चैतन्य लोक में राह दिखा सकती है। जब मैं इस मूक हृदय का प्राणपन आत्मनिवेदन देखता हूँ,जिसमे वह अपनी दीनता बताता रहता है, तब मैं यह सोच ही नहीं पाता कि उसने सहज बोध से मानव स्वरूप में कौन सा मूल्य आविष्कार किया है।
शांति निकेतन में रहती थी: